रूह की आवाज

अस्थिर है मन तेरा,

वो दर दर भटक रहा।

चाहता वो न जाने क्या,

न जाने क्यों वो यूँ डर रहा।

बेबसी में बेताब सा,

न जाने किसकी राह तक रहा।

अपनी सोच में न जाने क्यों,

यूँ रोज़ घुट घुट कर मर रहा।

उसे संभाल ले ,

वो तेरे ख़्वाबो से लाचार है।

सुन कभी अल्फाज़ो को अपने,

वो कुछ और नहीं तेरे रूह की आवाज है।

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